download (14)

दिल्ली व उतर भारत में 100 रुपये किलो बिक रहा टमाटर, जानें महंगाई का कारण व कहां होता है सबसे ज्यादा उत्पादन

दिल्ली और उत्तर भारत में टमाटर का भाव तेजी से बढ़ा है। इसकी कीमत 100 रुपये किलो तक पहुंच गई है. जानें भारत में सबसे ज्यादा कहां होता है टमाटर का उत्पादन।

जानें आखिर क्यों दिल्ली व उत्तर भारत में महंगा हुआ टमाटर
जानें आखिर क्यों दिल्ली व उत्तर भारत में महंगा हुआ टमाटर

टमाटर की कीमत में अचानक भारी उछाल देखने को मिल रहा है. दिल्ली और उत्तर भारत में इस समय टमाटर ((Tomato) का भाव 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। यह उछाल बीते दो दिनों में देखने को मिला है. इससे पहले, बाजार में टमाटर ((Tomato) की कीमत सिर्फ 25 से 30 रुपये प्रति किलो तक थी। मंडी में बढे भाव को लेकर नोएडा स्थित मंडी के सब्जी व्यापारी लालजी शाह का कहना है कि किसान ही उन्हें टमाटर ((Tomato) ज्यादा दाम में बेच रहे हैं। जिसकी वजह से उन्हें इसे महंगा बेचना पड़ रहा है।

इस साल यहां कम हुआ टमाटर का उत्पादन

वहीं, कृषि क्षेत्र से जुड़े विश्लेषकों ने कहा है कि पिछले दिनों देश के अधिकांश हिस्सों में देरी से बारिश व उच्च तापमान की वजह से टमाटर का उत्पादन बेहद कम हुआ था। जिसके चलते टमाटर की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है. दरअसल, हरियाणा और यूपी में हर साल टमाटर का उत्पादन बेहतर होता रहा है। लेकिन इस साल खराब मौसम ने इन राज्यों में टमाटर की उपज को कम कर दिया है। जिसकी वजह से मंडियों में पर्याप्त मात्रा में टमाटर की पूर्ति नहीं हो पा रही है। ऐसे में सब्जी व्यापारी बंगलुरु व अन्य इलाकों से टमाटर मंगाने पर मजबूर हैं। आज हम बताएंगे कि भारत में सबसे ज्यादा टमाटर का उत्पादन कहां होता है।

यहां होता है सबसे ज्यादा उत्पादन

राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा जारी आकड़ों के मुताबिक, भारत में कुल सात राज्य टमाटर का सबसे अधिक उत्पादन करते हैं। जिनमें आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। पूरे देश की 75 प्रतिशत टमाटर की उपज इन्हीं राज्यों में होती है। इसमें भी आंध्र प्रदेश नंबर वन पर काबिज है। यह राज्य अकेले लगभग 18 फीसदी टमाटर का उत्पादन करता है।

ऐसे होती है टमाटर की खेती

टमाटर की खेती के लिए भूमि की पीएच मान 6-7 होना चाहिए. इसके बाद, इसके बीजों को कुछ दूरी पर एक-दूसरे से अलग करके लगाएं ताकि पर्याप्त उपज हो सके। टमाटर के पौधों को बढ़ने के लिए उचित प्रकाश और नियमित रूप से पानी की आवश्यता होती है। वहीं, सबसे जरुरी बात यह है कि टमाटर के लिए उच्च तापमान का ध्यान देना आवश्यक है। अगर तापमान 35 डिग्री सेलसियस से अधिक हो जाता है तो इसकी प्रगति कम हो सकती है. ज्यादा तापमान के चलते ज्यादातर मामलों में पौधे खराब हो जाते हैं।

water-1-1

2025 तक दुनियाभर के दो-तिहाई लोग जल संकट से जूझेंगे

जिस तरह से दुनिया जल संकट की तरफ तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि विश्वभर में साल 2025 तक कई देश जल संकट की परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं। इस लेख में पढ़ें पूरी जानकारी।

Many countries will be forced to live in conditions of water crisis
Many countries will be forced to live in conditions of water crisis

भारत में 9.64 करोड़ क्षेत्र में मरुस्थलीकरण हो रहा है, जो भारत के कुल भूमि क्षेत्र का 30 फीसदी हिस्सा है। देखा जाए तो आने वाले दिनों में मरुस्थलीकरण काफी बड़ी समस्या बन सकती है। यह संयुक्त राष्ट्र के इस अनुमान से समझा जा सकता है कि साल 2025 तक दुनियाभर के दो-तिहाई लोग जल संकट की परिस्थितियों से जूझ सकते हैं, जिससे मरुस्थलीकरण के चलते विस्थापन बढ़ेगा और 13 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक विश्व भर के कुल क्षेत्रफल का करीब 20 फीसद भूभाग मरुस्थलीय के रुप में है। जबकि वैश्विक क्षेत्रफल का करीब एक तिहाई भाग सूखाग्रस्त भूमि के रूप में है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार गहन खेती के कारण 1980 से अब तक धरती की एक चौथाई उपजाऊ भूमि नष्ट हो चुकी है और दुनिया भर में रेगिस्तान का दायरा निरंतर विस्तृत हो रहा है इस कारण आने वाले समय में कई चीजों की कमी हो सकती है। विश्व भर में करीब एक सौ तीस लाख वर्ग किलोमीटर भूमि मानवीय क्रियाकलापों के कारण रेगिस्तान में बदल चुकी है। प्रति मिनट करीब 23 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बंजर भूमि में तब्दील हो रही है। इस कारण खाद्यान्न उत्पादन में प्रतिवर्ष दो करोड़ टन की कमी आ रही है। दुनिया के दो तिहाई हिस्से में भू क्षरण की समस्या गंभीर हो गई है। इस कारण कृषि उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है, सूखे तथा प्रदूषण की चुनौती भी बढ़ रही है। भूमि में प्राकृतिक कारणों तथा मानवीय गतिविधियों के कारण जैविक या आर्थिक उत्पादन में कमी की स्थिति को भू-क्षरण कहा जाता है। जब यह अपेक्षाकृत सूखे के क्षेत्र में घटित होता है, तो तब इसे मरुस्थलीकरण कहा जाता है। दरअसल इस समय पूरी दुनिया में धरती पर सिर्फ 30 फ़ीसदी हिस्से में ही वन शेष बचे हैं और उसमें से भी प्रतिवर्ष इंग्लैंड के आकार के बराबर हर साल नष्ट हो रहे हैं दुनिया भर में लोगों के लिए खाने-पीने की समुचित उपलब्ध बनाए रखने की खातिर भू-क्षरण रोकना और नष्ट हुई उर्वरक भूमि को उपजाऊ बनाना आवश्यक है।

चीन ने अपने एक बहुत बड़े रेगिस्तान के क्षेत्र को 30 सालों में हरे-भरे मैदान में बदलकर दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की. जहां तक भारत का सवाल है, यहां मरुस्थलीकरण बड़ी समस्या बनता जा रहा है। मरुस्थली क्षेत्र विस्तार भूक्षरण और सूखे पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र के एक उच्च स्तरीय संवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया था कि भारत अगस्त 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि को उपजाऊ बनाने की दिशा में अग्रसर है जिससे ढाई से तीन अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन अवशोषित किया जा सकेगा। भू क्षरण से फिलहाल भारत की करीब 30 फ़ीसदी भूमि प्रभावित है, जो बेहद चिंताजनक है। पर्यावरण क्षति की भरपाई के प्रयासों के तहत पिछले एक दशक में करीब 300000 हेक्टेयर वन क्षेत्र का विस्तार किया गया है।

भारत ने जून 2019 में परीक्षण के तौर पर पांच राज्य हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, नगालैंड, कर्नाटक में वनाच्छादित क्षेत्र बढ़ाने की परियोजना शुरू की थी और अब इस परियोजना को धीरे-धीरे मरुस्थलीकरण से प्रभावित अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जा रहा है। प्रकाशित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि देशभर में 9.64 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में मरुस्थलीकरण हो रहा है, जो भारत के कुल भूमि क्षेत्र का करीब 30 फ़ीसदी हिस्सा है।

इस क्षरित भूमि का 80 फीसदी हिस्सा केवल 9 राज्यों में राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, और तेलंगाना में है। दिल्ली, त्रिपुरा, नागालैंड, हिमाचल प्रदेश और मिजोरम में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया काफी तेज है। भारत के कई राज्यों जैसे कि झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा के लगभग 50% से भी अधिक हिस्सों में क्षरण हो रहा है। बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से मरुस्थलीकरण अर्थात उपजाऊ जमीन के बंजर बन जाने की समस्या विकराल हो रही है। सूखे इलाकों में जब लोग पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का जरूरत से ज्यादा दोहन करते हैं तो वहां पेड़ पौधे खत्म हो जाते हैं और उस क्षेत्र की जमीन बंजर हो जाती है अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से वैश्विक स्तर पर मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए जन जागरूकता का बढ़ावा दिया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1994 में मरुस्थलीकरण रोकथाम का प्रस्ताव रखा था। भारत में उस पर 14 अक्टूबर 1994 को हस्ताक्षर किए। देश के थार मरुस्थल ने उत्तर भारत के मैदानों को सर्वाधिक प्रभावित किया है। चिंताजनक स्थिति यह है कि थार के मरुस्थल में प्रतिवर्ष 13000 एकड़ से भी अधिक बंजर भूमि को वृद्धि हो रही है।

moringa leaf and powder capsule on  a wooden background

सहजन जूस पीने के हैं अद्भुत फायदे, पढ़ें पूरी विधि

अगर आप बार-बार पेट की परेशानी का सामना करते रहते हैं, तो एक बार यह लेख जरूर पढ़ें। ताकि आप इस दिक्कत से मुक्ति पा सकें।

This disease will stay away from drinking drumstick juice
This disease will stay away from drinking drumstick juice

अक्सर शादी व पार्टी में अधिक खाना खाने के बाद कुछ लोगों के पेट खराब हो जाता है. कुछ लोगों को तो कब्ज जैसी परेशानी का सामना भी करना पड़ता है. कब्ज की दिक्कत के चलते लोगों का बैठना व उठना तक मुश्किल हो जाता हैं।

ऐसे में व्यक्ति इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए दवा व अन्य कई चीजों का सेवन करता है, जो बाजार में उपलब्ध होती हैं. लेकिन फिर भी उन्हें इससे पूरी तरह से मुक्ति नहीं मिलती है. लेकिन आज हम जिस चीज के बारे में बताने जा रहे हैं, उसका सेवन करने मात्र से ही आपको कब्ज से व पेट की जलन से पूरी तरह से मुक्ति मिल जाएगी।

सहजन का जूस (Drumstick juice)

सहजन के नाम से तो ज्यादातर लोग प्रचित होंगे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे खाने से जितने फायदे मिलते हैं, ठीक उसी तरह से इसके जूस पीने से भी व्यक्ति के पेट से संबंधित कई बीमारी दूर हो जाती हैं. सहजन की फली का जूस जिद्दी से जिद्दी कब्ज की परेशानी से मिनटों में मुक्ति दिलाता है. आइए अब इसके जूस के फायदे के बारे में भी थोड़ा जान लेते हैं।

सहजन जूस बनाने की विधि (Drumstick juice recipe)

सबसे पहले आप सहजन की फलियों को सही तरीके से तोड़ लें और फिर इसे अच्छे से पानी से साफ करें. फिर आपको इसे गर्म पानी में बोइल करना है. इसके बाद आपको इसे मिक्सी मशीन में डालकर जूस बना लेना है. आप चाहे तो इसमें अपने स्वाद के अनुसार कुछ चीजों को भी शामिल कर सकते हैं. जैसे कि चीनी, नमक और पानी आदि लेकिन यह सब आपको बहुत ही थोड़ी मात्रा में डालनी हैं।

कब्ज से छुटकारा

अगर आप सहजन का जूस पीते हैं, तो आपको बार-बार होने वाली कब्ज की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। ताकि आप शादी-पार्टी में बने खाने का आनंद आसानी से उठा पाएं।

डायबिटीज (Diabetes)

यह जूस किसी आयुर्वेदिक औषधि से कम नहीं है। दरअसल, डॉक्टर भी सहजन की फली का जूस पीने की सलाह देते हैं, क्योंकि इसे डायबिटीज के रोगियों को लाभ मिलता है. यह शरीर में ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद करता है।

हड्डियां मजबूत

इस जूस को नियमित रुप से पीने से शरीर की हड्डियां मजबूत बनती हैं। अगर किसी व्यक्ति की हड्डिया कमजोर हैं, तो वह इस जूस का सेवन जरूर करें. क्योंकि इस जूस में एंटी-इंफ्लामेंट्री गुण व अन्य कई प्रोटीन पाएं जाते हैं।

tomato-1

Tomato Variety: टमाटर की 5 हाइब्रिड किस्मों से किसान को मिलेगा अच्छा लाभ, पढ़ें पूरी डिटेल

टमाटर की खेती (Tomato cultivation) करने वाले किसान भाइय़ों के लिए यह लेख काफी मददगार साबित हो सकता है क्योंकि इसमें टमाटर की ऐसी किस्मों के बारे में बताया गया है, जिसे उगाकर किसान अच्छी कमाई कर सकता है।

Hybrid variety of tomato
Hybrid variety of tomato

देश के किसान भाइयों के लिए टमाटर की खेती (Tomato cultivation) किसी फायदे से कम नहीं है। दरअसल इस सब्जियों से किसान हर महीने में अच्छा मुनाफा पा सकते हैं। यह एक ऐसी सब्जी फल है, जिसकी मांग बाजार में साल भर बनी रहती है। इसी के चलते मंडी एवं मार्केट में इसकी कीमत भी हमेशा उच्च रहती है।

अगर आप भी टमाटर की खेती करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको इसकी सबसे अच्छी किस्मों का चयन करना चाहिए। ताकि आप कम समय में अधिक पैदावार पा सके और फिर उसे सरलता से बाजार में बेचकर मुनाफा कमा सके. जैसा कि आप सब लोग जानते हैं कि खरीफ का सीजन शुरु हो चुका है और देश के ज्यादातर राज्यों में टमाटर की बुवाई किसान भाइयों ने करना भी शुरु कर दी है। अगर आपने अभी तक नहीं की हैं, तो यह लेख आपके लिए अच्छा साबित हो सकता है। दरअसल, आज हम आपके लिए टमाटर की कुछ बेहतरीन किस्मों की जानकारी लेकर आए हैं जिसे आप अपने खेत में सरलता से लगा सकते हैं और डबल मुनाफा पा सकते हैं। तो आइए टमाटर की बेहतरीन किस्मों के बारे में जानते हैं…

अर्का रक्षक (Arka Rakshak)

जैसा कि इसके नाम से पता चलते है कि यह किस्म एक रक्षक है। जी हां यह किस्म टमाटर में लगने वाले प्रमुख रोग, पत्ती, मोड़क विषाणु, जीवाणु झुलसा व अगेती धब्बे की प्रतिरोधी होती है। मिली जानकारी का मुताबिक, टमाटर की यह किस्म लगभग 140 दिनों के अंदर पूरी तरह से तैयार हो जाती है। इससे किसान प्रति हेक्टेयर 75 से 80 टन तक फल का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। वहीं इसके फलों के वजन की बात करें, तो इनका वजन मध्यम से भारी यानी 75 से 100 ग्राम होता है। यह टमाटर गहरे लाल रंग के होते हैं।

अर्का अभेद  (Arka Abhed)

इसे टमाटर की सबसे हाइब्रिड किस्म (Most Hybrid variety of tomato) कहा जा सकता है. क्योंकि यह 140 से 145 दिनों के अंदर तैयार हो जाती है। इस किस्म का एक टमाटर लगभग 70 से 100 ग्राम तक पाया जाता है। इसकी खेती से किसान भाई प्रति हेक्टेयर से 70-75 टन तक फल प्राप्त कर सकते हैं।

दिव्या (Divya)

टमाटर की इस किस्म को रोपाई के 75 से 90 दिनों के अंदर ही किसान को लाभ मिलना शुरु हो जाता है। इसमें पछेता झुलसा और आंख सडन रोग के लिए रोधी किस्म मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि दिव्या किस्म के टमाटर लंबे समय तक चलते हैं। इसके एक फल का वजन भी काफी अच्छा होता है। देखा जाए तो 70-90 ग्राम तक एक टमाटर होता है।

अर्का विशेष (Arka Vishesh)

इस टमाटर की किस्म से किसान प्रति हेक्टेयर 750-800 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। यह कई तरह के उत्पादनों को बनाने में भी इस्तेमाल होता है। इस किस्म के प्रति टमाटर का वजन 70 से 75 ग्राम होता है।

पूसा गौरव (Pusa Gaurav)

इसके टमाटर एक दम लाल रंग के होते हैं और यह आकार में भी अच्छे होते हैं। साथ ही यह चिकने होते ह। इसी के चलते बाजार में इसकी मांग अधिक होती है और यह एक ऐसा टमाटार है, जिसे अन्य बाजारों यानी की दूसरे राज्यों व विदेशों में भी भेजा जाता है।

images (21)

चीना की खेती कर दो महीने में किसान हो जायेंगे मालामाल! इसी महीने करें शुरुआत

मोटा अनाज यानी श्री अन्न को पूरे विश्व में बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में किसानों को भी इसकी खेती के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। ऐसे में हम आपको यहां एक खास प्रकार के मोटे अनाज की खेती (millets cultivation) की जानकारी दे रहे हैं, जिसकी खेती कर किसान कम समय में ही अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

Know about Proso millets cultivation in india and their benefits
Know about Proso millets cultivation in india and their benefits

पूरी दुनिया में एक बार फिर से अपने पोषण तत्वों की वजह से जाने-जाने वाले मोटे अनाज का दौर लौट रहा है। यही वजह है कि 2023 को अर्न्तराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया गया है। ऐसे में पूरे देश में मोटे अनाज की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी कड़ी में हम आपके लिए एक खास प्रकार के मोटे अनाज की खेती की जानकारी लेकर आए हैं।

चीना’ एक मोटा अनाज

हम यहां बात कर रहे हैं चीना (Proso Millet) की खेती की। चीना एक प्रकार का मोटा अनाज है, जिसकी खेती 10,000 ईसा पूर्व से ही भारत, चाइना, मलेशिया सहित कई विभिन्न देशों में किया जाता था। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. भारत में भी इसे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि तमिलनाडु में इसे पानी वारागु, पंजाब और बंगाल में चीना, महाराष्ट्र में वरी, गुजरात में चेनो, कर्नाटक में बरागु सहित विभिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

भारत में चीना की खेती कहां-कहां होती है?

भारत में मुख्य रूप से इसकी खेती बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कनार्टक, तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में की जाती है।

चीना की खेती के बारे में जानकारी

चीना की खेती का सही समय- आमतौर पर चीना की खेती खरीफ सीजन यानी की जून या इस महीने के बाद की जाती है. लेकिन भारत और दुनिया के कई इलाकों में इसकी बुवाई जून से पहले यानी की गर्मियों के दौरान की जाती है और इसे मानसून के दौरान खेतों से निकाल लिया जाता है।

चीना फसल तैयार होने का समय- चीना की फसल बुवाई के बाद 60 से 90 दिनों के अंदर कटाई के लिए तैयार हो जाती है.

चीना फसल के लिए भूमि- इसकी खेती रूखी सूखी जमीन पर भी आसानी से की जा सकती है.

चीना फसल में सिंचाई- इसकी खेती में पानी बहुत कम लगता है। ऐसे में कम सिंचाई के साथ भी इसकी खेती की जा सकती है।

चीना के फायदें

चीना एक ग्लूटेन फ्री मोटा अनाज है. इसमें भरपूर मात्रा में सभी प्रकार के एमिनो एसिड और कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं। साथ ही इसमें आयरन, मिनरल्स, मैग्नीशियम और फास्फोरस सहित कई पोषण तत्व पाए जाते हैं। इससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ निम्नलिखित हैं-

डायबिटीज मरीजों के लिए फायदेमंद

खून की अच्छी भरपाई करता है

चीना पचने में आसान होता है

लंबे समय तक पेट भरा रहता है जिससे बुहत देर तक भूख नहीं लगती (जो वजन कम करने में सहायक हो सकता है)

खून की कमी नहीं होने देता

paddy-1

धान में पानी बचाने के बेहतरीन तरीके, फसल में भी होगी वृद्धि 

अगर आप धान की फसल में अधिक पानी का इस्तेमाल करते हैं, तो यह लेख आप एक बार जरूर पढ़े. ताकि आप धन की फसल में पानी बचाने के तरीके को जानकर लाभ पा सके. बता दें इन तरीकों से आप पानी की बचत तो करेंगे ही साथ ही फसल में भी तेजी से वृद्धि होगी.

How to save water in paddy?
How to save water in paddy?

हरियाणा के कुल भौगोलिक क्षेत्र में से, 80 % भू-भाग पर खेती की जाती है और उसमे से 84% क्षेत्र सिंचित खेती के अंदर आता है। राज्य की फसल गहनता 181 % है और कुल खाद्यान्न उत्पादन 13.1 मिलियन टन है। प्रमुख फसल प्रणालियां चावल-गेहूं, कपास-गेहूं और बाजरा-गेहूं हैं। राज्य का लगभग 62% क्षेत्र खराब गुणवत्ता वाले पानी से सिंचित किया जाता है। इसके बावजूद भी किसान धान की खेती करता है।  राज्य में चावल की खेती के तहत लगभग 1 मिलियन हेक्टेयर है, जो ज्यादातर सिंचित है। राज्य की औसत उत्पादकता लगभग 3.1 टन/हेक्टेयर है। धान की लगातार खेती और इसमें सिंचाई के लिए पानी के इस्तेमाल से लगातार भूजल का स्तर गिरता जा रहा है। धान के उत्पादन में प्रमुख बाधाएं हैं. पानी की कमी, मिट्टी की लवणता क्षारीयता, जिंक की कमी और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट। इस लेख में धान की खेती में पानी की बचत करने के बारे में बताया गया है।

कम अवधि वाली किस्में

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (SAU) ने पूसा बासमती 1509 (115 दिन), पूसा बासमती 1692 (115 दिन) और पूसा बासमती 1847 (125 दिन) और पूसा बासमती 1847 (125 दिन) सहित उच्च उपज वाली कम अवधि वाली बासमती चावल की किस्में विकसित की हैं। गैर-बासमती श्रेणी में सुगंधित चावल की किस्में PR 126 (120-125 दिन), पूसा एरोमा 5 (125 दिन) और पूसा 1612 (120 दिन) आती है। जल्दी पकने वाली ये किस्में लगभग 20-25 दिन पहले परिपक्व हो जाती हैं जो किसानों को पुआल प्रबंधन के लिए समय देती है इसके साथ गेहूं की बुवाई के लिए खेतों की तैयार करने का भी समय मिल जाता है। दो से पांच सप्ताह कम समय की वजह से पानी की लागत भी कम हो जाती है।

प्रत्यारोपण का समय

उच्च बाष्पीकरणीय मांग की अवधि (जून) के दौरान चावल की रोपाई के परिणामस्वरूप बहुत अधिक भूजल का खनन हो सकता है। भारतीय राज्य हरियाणा, पंजाब, दिल्ली में जल स्तर वर्तमान में 0.5-1.0 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिर रहा है। अनाज की पैदावार बढ़ाने और पानी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए पानी की बचत की तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है। धान की रोपाई जून के आखिरी सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह में करनी चाहिए।  ऐसा करने से वाष्पीकरण से उड़ने वाले पानी की बचत होती है और पैदावार का भी ज्यादा नुकसान नहीं होता।  

वैकल्पिक गीली सूखी विधि (AWD)

वैकल्पिक गीली सूखी (AWD) विधि धान की खेती में जल को बचाने के साथ-साथ मीथेन के उत्सृजन को भी नियंत्रित करती है। इस विधि का उपयोग तराई में रहने वाले किसान सिंचित क्षेत्रों में अपने पानी की खपत को कम करने के लिए कर सकते हैं। इस तकनीक का उपयोग करने वाले चावल के खेतों को बारी-बारी से पानी से भरा जाता है और सुखाया जाता है। AWD में मिट्टी को सुखाने के दिनों की संख्या मिट्टी के प्रकार और धान की किस्म के अनुसार 1 दिन से लेकर 10 दिनों से अधिक तक हो सकती है।

कृषि से 10 % ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए चावल की खेती जिम्मेदार है।  AWD को नियंत्रित सिंचाई भी कहा जाता है। सुखी और कठोर मिट्टी में सिंचाई के दिनों की संख्या 1 से 10 दिनों से अधिक हो सकती है। AWD तकनीक को लागू करने का एक व्यावहारिक तरीका एक साधारण वॉटर ट्यूब का उपयोग करके क्षेत्र में जल स्तर की गहराई का ध्यान रखना पड़ता है। जब पानी का स्तर मिट्टी की सतह से 15 से0मी0 नीचे होता है, लगभग 5 से0मी0 तक सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। ऐसा हमे धान में फ्लॉवरिंग के समय करना चाहिए। पानी की कमी से बचने के लिए चावल के खेत में पानी की गहराई 5 सें0मी0 होनी चाहिए, जिससे चावल के दाने की उपज को नुकसान नहीं होता। 15 सें0मी0 के जल स्तर को ‘सुरक्षित AWD‘ कहा जाता है, क्योंकि इससे उपज में कोई कमी नहीं आएगी। चावल के पौधों की जड़ें तर बतर मिट्टी से पानी लेने में सक्षम होती है।

धान की सीधी बिजाई (डीएसआर)

यहां पहले से अंकुरित बीजों को ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन द्वारा सीधे खेत में डाला जाता है। इस पद्धति में कोई नर्सरी तैयार करने या रोपाई शामिल नहीं है। किसानों को केवल अपनी भूमि को समतल करना है और बिजाई से पहले एक सिंचाई करनी होती है।

यह पारंपरिक पद्धति से किस प्रकार भिन्न है?

धान की रोपाई में, किसान नर्सरी तैयार करते हैं जहाँ धान के बीजों को पहले बोया जाता है और पौधों में खेतों में रोपाई की जाती है। नर्सरी बीज क्यारी प्रतिरोपित किए जाने वाले क्षेत्र का 5-10% है। फिर इन पौधों को उखाड़कर 25-35 दिन बाद पानी से भरे खेत में लगा दिया जाता है।

डीएसआर का लाभः

  • पानी की बचत:डीएसआर के तहत पहली सिंचाई बुवाई के 21 दिन बाद ही आवश्यक है। इसके विपरीत रोपित धान में, जहां पहले तीन हफ्तों में जलमग्न/बाढ़ की स्थिति सुनिश्चित करने के लिए व्यावहारिक रूप से रोजाना पानी देना पड़ता है।
  • कम श्रम:एक एकड़ धान की रोपाई के लिए लगभग 2,400 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से तीन मजदूरों की आवश्यकता होती है। डीएसआर में इस श्रम की बचत हो जाती है।  
  • डीएसआर के तहत खरपतवार नाशी की लागत 2,000 रुपये प्रति एकड़ से अधिक नहीं होगी।
  • खेत के कम जलमग्न होने के कारण मीथेन उत्सर्जन को कम होता है और चावल की रोपाई की तुलना में मिट्टी के साथ ज्यादा झेडझाड़ भी नहीं होती।

रिज बेड ट्रांसप्लांटिंग

कठोर बनावट वाली मिट्टी में सिंचाई के पानी को बचाने के लिए धान को मेड़ों/क्यारियों पर लगाया जा सकता है। खेत की तैयारी के बाद (बिना पडलिंग किए), उर्वरक की एक बेसल खुराक डालें और रिजर गेहूँ की क्यारी बोने की मशीन से मेड़ों/क्यारियों तैयार करें। रिज में सिंचाई करें और मेड़ों/क्यारियों के ढलानों (दोनों तरफ) के मध्य में पौधे से पौधे की दूरी 9 सें.मी. प्रति वर्ग मीटर 33 अंकुरों को सुनिश्चित करके रोपाई करे।  

लेजर भूमि समतल

धान की रोपाई के बाद स्थापित होने के लिए पहले 15 दिनों के लिए धान के खेत को जलमग्न रखने की आवश्यकता होती है। अधिकतर नर्सरी के पौधे या तो खेत में पानी की कमी या अधिकता के कारण मर जाते हैं। इस प्रकार, उचित पौधे के खड़े होने और अनाज की उपज के लिए भूमि का समतलीकरण करना बहुत आवश्यक है। अध्ययनों ने संकेत दिया है कि खराब फार्म डिजाइन और खेतों की असमानता के कारण खेत में सिंचाई के दौरान पानी की 20-25 % मात्रा बर्बाद हो जाती है।

लेजर लेवेलर के फायदे निम्नलिखित हैः

  • सिंचाई के पानी की बचत करता है।
  • खेती योग्य क्षेत्र में लगभग 3 से 5% की वृद्धि होती है।
  • फसल स्थापना में सुधार होता है।
  • फसल परिपक्वता की एकरूपता में सुधार होता है।
  • जल अनुप्रयोग दक्षता को 50% तक बढ़ाता है।
  • फसल की पैदावार में बढ़ोतरी होती है (गेहूं 15%, गन्ना 42%, चावल 61% और कपास 66% )
  • खरपतवार की समस्या कम होती है और खरपतवार नियंत्रण दक्षता में सुधार होता है।
images (16)

खरीफ में हरा चारा और ज्वार की बुवाई का समय, बीज दर, उन्नत किस्में, उपज और खरपतवार नियंत्रण

खरीफ में ज्वार की फसल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। ज्वार की किस्मों में एक कटाई से लेकर तीन-चार कटाईयां देने की क्षमता है। गर्मी के मौसम में उगाई गई ज्वार में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए क्योंकि ज्वार के चारे में धुरिन नामक विषैले पदार्थ की मात्रा विशेषकर गर्मी के मौसम में अधिक हो जाती है। पशुओं के लिए इसका चारा पर्याप्त रूप से पौष्टिक होता है। ज्वार का हरा चारा, कड़वी तथा साइलेज तीनों ही रूपों में पशुओं के लिए उपयोगी है।

खरीफ में ज्वार की फसल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। ज्वार की किस्मों में एक कटाई से लेकर तीन-चार कटाईयां देने की क्षमता है। गर्मी के मौसम में उगाई गई ज्वार में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए क्योंकि ज्वार के चारे में धुरिन नामक विषैले पदार्थ की मात्रा विशेषकर गर्मी के मौसम में अधिक हो जाती है। पशुओं के लिए इसका चारा पर्याप्त रूप से पौष्टिक होता है। ज्वार का हरा चारा, कड़वी तथा साइलेज तीनों ही रूपों में पशुओं के लिए उपयोगी है।

खेत की तैयारी

इसकी खेती वैसे तो सभी पराक्र की मिट्टी में कि जा सकती है परन्तु दोमट, बलुई दोमट, सर्वोत्तम मानी गई है। ज्वार के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करना आवश्यक है। सिंचित इलाकों में दो बार गहरी जुताई करके पानी लगाने के बाद बत्तर आने पर दो जुताइयां करनी चाहिए।

बुवाई का समय

सिंचित इलाकों में ज्वार की फसल 20 मार्च से 1- जुलाई तक बो देनी चाहिए. जिन क्षेत्रों में सिंचाई उपलब्ध नहीं हैं वहां बरसात की फसल मानसून में पहला मौका मिलते ही बो देनी चाहिए। अनेक कटाई वाली किस्मों/संकर किस्मों की बीजाई अप्रैल के पहले पखवाड़े में करनी चाहिए। यदि सिंचाई व खेत उपलब्ध न हो तो बीजाई मई के पहले सप्ताह की जा सकती है।

चारे की विभिन्न किस्में

एक कटाई देने वाली किस्में–हरियाणा चरी 136, हरियाणा चारी 171 हरियाणा चरी 260, हरियाणा चरी 307, पी.ससी-9 अधिक कटाई वाली किस्में-मीठी सूडान (एस एस जी 59-३), एफ, एस एच 92079 (सफेद मोती) बीज एवं बीज की मात्रा यदि कहत भली प्रकार तैयार हो तो बुवाई सीडड्रील से 2.5 से 4 सेंमी गहराई पर एवं 25-30 सेंटीमीटर की दूरी पर लाइनों में करें. ज्वार की बीज दर प्रायः बीज के आकार पर निर्भर करती है। बीज की मात्रा 18 से 24 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से बीजाई करें। यदि खेत की तैयारी अच्छी प्रकार न हो सके तो छिटकाव विधि से बुवाई की जा सकती है जिसके लिए बीज की मात्रा में 15-20% वृद्धि आवश्यक है। अधिक कटाई वाली किस्में/संकर किस्मों के ली 8-10 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ के हिसाब से डालें।

खाद एवं उर्वरक

सिंचित इलाकों में इस फसल के लिए 80 किलोग्राम नाइट्रोजन व 30 किलोग्राम फास्फोरस प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। सही तौर पर 175 किलोग्राम यूरिया और 190 किलोग्राम एस एस पी एक हैक्टर में डालना पर्याप्त रहता है। यूरिया की आधी मात्रा और एस एस पी की एक पूरी मात्रा बीजाई से पहले डालें तथा यूरिया की बची हुई आधी मात्रा बीजाई एक 30-35 में 50 किलोग्राम नाइट्रोजन (112 किलोग्राम यूरिया) प्रति हैक्टर बीजाई से पहले डालें। अधिक कटाई देने वाली किस्मों से पहले व 30 किलो नाइट्रोजन प्रति हैक्टर हर कटाई के बाद सिंचाई उपरांत डालने से अधिक पैदवार मिलती है।

सिंचाई

वर्षा ऋतु में बोई गई फसल में आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। मार्च व अप्रैल में बीजी गई फसल में पहली सिंचाई बीजाई के 15-20 दिन बाद तथा आगे की सिंचाई 10-15 दिन के अंतर पर करें. मई-जून में बीजी गई फसल में 10-15 दिन के बाद पहली सिंचाई करें तथा बाद में आवश्यकतानुसार करें। अधिक कटाई वाली किस्मों में हर कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करें. इससे फुटव जल्दी व अच्छा होगा।

खरपतवार नियंत्रण

ज्वार में खरपतवार की समस्या विशेष तौर पर वर्षाकालीन फसल में अधिक पाई जाती है। सामान्यतः गर्मियों में बीजी गई फसल में एक गोड़ाई पहली सिंचाई के बाद बत्तर आने पर पर करनी चाहिए। यदि खरपतवार की समस्या अधिक हो तो एट्राजीन का छिड़काव् करे। क्योंकि चारे की ज्वार में किसी भी प्रकार के रसायन के छिड़काव को बढ़ावा नहीं दिया जाता।

रोग एवं कीट नियंत्रण

चारे की फसल में छिड़काव् कम ही करना चाहिए तथा छिड़काव् के बाद 25-30 दिन तक फसल पशुओं को नहीं खिलानी चाहिए।

कटाई और एच.सी. एन. का प्रबंध

चारे की अधिक पैदावार व गुणवत्ता के लिए कटाई 50% सिट्टे निकलने के पश्चात करें. एच.सी.एन. ज्वार में एक जहरीला तत्व प्रदान करता अहि। अगर इसकी मात्रा 2000 पी.पी.एम्. से अधिक हो तो यह पशुओं के लिए हानिकारक हो सकता है। 35-40 दिन की फसल में एच.सी. एन की मात्रा अधिक होती है। लेकिन 40 दन के बाद इसकी मात्रा अधिक होती है। लेकिन 40 दिन से पहले नहीं काटना चाहिए। अगर कटाई 40 दिन में करनी अत्यंत आवश्यक हो तो कटे  हुए चारे को पशुओं को खिलाने से पहले 2-3 घंटे तक खुली हवा में छोड़ डे ताकि एच.सी. एन. की मात्रा कुछ कम हो सके।

अधिक कटाई वाली किस्मों में हरे चारे की अधिक पैदवार के लिए पहली कटाई बीजाई के 50 से 55 दिनों के पश्चात एवं शेष सभी कटाईयां 35-49 दिनों के अंतराल पर करें। अगर पहली कटाई देर से की जाए तो सूखे चारे में वृद्धि होती है परन्तु हरे चारे की पैदवार व गुणवत्ता कम हो जाती है। अच्छे फुटाव के लिए फसल को भूमि से 8 -10 सेंटीमीटर की उंचाई पर से काटें।

बीज का बनना

दाने वाली फसल के लिए बीजाई 10 जुलाई तक रकें। इस समय बीजी गई फसल से दाने की पैदवार सबसे ज्यादा मिलती है। जल्दी मिलती है। जल्दी बिजी गई फसलों में मिज कीड़े का आक्रमण इतना अधिक होता है कि दाने का रस चूसने से पैदवार काफी घट जाती है।

उपज

चारे की उपज ज्वार की किस्म तथा कटाई की अवस्था  पर काफी कुछ  निर्भर करती हैं यदि उन्नत तरीकों से खेती की जाए तो एक कटाई वाली फसल से 250-400 क्विंटल व् अधिक कटाई वाली किस्मों से हरे चारे की उपज 500-700 किवंटल प्रति हैक्टर प्रातो हो सकते हैं।

images (15)

ज्वार की फसल से किसानों को दोहरा लाभ, होगी मानव व पशु आहार की व्यवस्था

अगर आप खेती करने की सोच रहे हैं तो ऐसे में आप ज्वार की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं, यह फसल आपको अच्छी सेहत के साथ मोटा मुनाफा भी देगी।

Sorghum crop cultivation in india
Sorghum crop cultivation in india

ज्वार मुख्य रूप से खरीफ की एक प्रमुख मिलैट फसलों में से एक है। जिसे किसान भाई खाने के साथ-साथ चारे एवं दाने के रूप में उगाते हैं तथा ज्वार को मोटे अनाजों का राजा भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश में ज्वार की फसल मुख्य रूप से चारे के लिये उगाई जाती है। ज्वार का इस्तेमाल चारे के रूप में किया जाता है। जानवरों को हरे चारे एंव सूखे चारे तथा साइलेज बनाकर खिलाया जाता है। इस प्रकार ज्वार जानवरों का महत्वपूर्ण एंव पौष्टिक चारा है। गेहूं की तरह ज्वार को भी आटे के रूप में प्रयोग करते हैं। ज्वार में शर्करा की काफी मात्रा पाई जाती है तथा ज्वार की अच्छी फसल के लिये मृदा का पी.एच. मान 5.5-8.5 होना चाहिये।

जलवायुः-ज्वार उष्ण जलवायु की फसल है परन्तु शीघ्र पकने वाली जातिया ठंडे प्रदेशों में भी गर्मीं के दिनों में उगाई जा सकती हैं। 25-30 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर उचित नमी की उपस्थिति में ज्वार की वृद्धि सबसे अच्छी होती है। फसल में बाली निकलते समय 30 डिग्री सेल्सियस सें अधिक तापक्रम, फसल के लिये हानिकारक होता है। 

खेत का चुनाव तथा तैयारीः- बलुई दोमट अथवा ऐसी भूमि जहां जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो, ज्वार की खेती के लिये उपयुक्त होती है। मिटृी पलटने वाले हल से पहली जुताई तथा अन्य दो-तीन जुताई देशी हल से करके खेत को भाली भांति तैयार कर लेना चाहियें।

बुवाई का समयः-

  1. खरीफ ज्वारः- ज्वार की बुवाई हेतु जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय अधिक उपयुक्त है।
  2. रबी ज्वारः- रबी के मौसम में ज्वार की खेती महाराष्ट्र, कर्नाटक व आन्ध्रप्रदेश में की जाती है। यहां पर बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर से नवम्बर तक है।

उन्नतशील प्रजातियां:- ज्वार की संकर किस्मों में सी.एस.एच.-1 से सी.एस.एच.-8 तक तथा उच्च उपज वाली किस्में सी.एस.वी.-1 से  सी.एस.एच.-7 तथा उ.प्र. में मऊ टा-1, 2, वर्षा, सी.एस.वी.-13, 15 एंव संकर सी.एस.एच.-9, 14 तथा रबी चारे के लिये एम.35-1 तथा चारे वाली किस्में एम-35-1, पूसा चरी, राजस्थान चरी, एस.एस.जी.-888 मीठी सुडान उपयुक्त किस्म है। 

बीज की मात्राः-दाने के खेत की बुआई के लिए किसान भाईयों को  9-12 किलोग्राम/प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है तथा चारे के खेत की बुवाई के लिये किसान भाईयों को 35-40 किलोग्राम/प्रति हेक्टेयर है।

बीजोपचारः-किसान भाईयों का बोने से पूर्व एक किग्रा0 बीज को एक प्रतिशत पारायुक्त रसायन या थीरम के 2.5 ग्राम से शोधित कर लेना चाहियें। जिससे अच्छा जमाव होता है एवं कंडुवा रोग नहीं लगता है। दीमक के प्रकोप से बचने हेतु 25 मि0लीटर प्रति किग्रा0 बीज की दर से क्लोरोपायरीफास दवा से शोधित करना चाहियें।

पंक्तियों एंव पौधों की दूरीः-ज्वार की फसल की बुआई किसान भाईयों को 45 सेमी0 लाइन से लाइन की दूरी पर हल के पीछे करनी चाहियें। पौधे से पौध की दूरी 15-20 सेमी0 होनी चाहिये।

उर्वरक एंव खाद प्रबन्धः-किसान भाईयों को उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना श्रेयस्कर होगा। उत्तम उपज के लिये संकर प्रजातियों के लिये नत्रजन 80 फॅास्फारेस 40 एवं पोटाश 20 किग्रा0 एवं अन्य प्रजातियों हेतु नत्रजन 40 फास्फारेस 20 एवं पोटाश 20 किग्रा0 प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिये। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फोस्फोरस एंव पोटाश की पूरी मात्रा खेत में बुवाई के समय कूंडों में  बीज के नीचे डाल देनी चाहियें तथा नत्रजन का शेष भाग बुवाई के लगभग 30-35 दिन बाद खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहियें।

सिंचाई प्रबन्धः-फसल में बाली निकलते समस और दाना भरते समय यदि खेत में नमी कम हो तो सिंचाई अवश्य कर दी जाए अन्यथा इसका उपज पर प्रतिकूल प्रभाव दिखाई पड़ता है।

खरपतवार नियन्त्रणः-ज्वार की फसल में किसान भाईयों को तीन सप्ताह बाद निराई एवं गुडाई कर देनी चाहियें। यदि खेत में पौधों की संख्या अधिक हो तो थिनिंग कर दूरी निश्चित कर ली जाय।

रसायन नियन्त्रण के लिये एट्राजिन 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के तुरन्त बाद 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव कर देना चाहियें।

कीट नियन्त्रणः- ज्वार की प्ररोह मक्खी (शूट फलाई):- यह घरेलू मक्खी से छोटे आकार की होती है।  जिसका शिशु (मैगेट) जमाव के प्ररम्भ होते ही फसल को हानि पहुंचाता  है। इसके उपचार हेतु मिथाइल ओडिमेटान 25 ई.सी. 1 लीटर अथवा मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. 1 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिडकाव करें।

तनाछेदक कीटः- इस कीट की सुंडियां तनें में छेद करके अन्दर ही अन्दर खाती रहती है। जिससे बीज का गोभ सूख जाता है। इसके उपचार हेतु क्विनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. 1.50 लीटर को 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।

ईयर हेड मिजः- प्रौढ मिज लाल रंग की होती है और यह पुष्प पत्र पर अण्डे देती है। लाल मैगेट्स दानों के अन्दर रहकर उसका रस चूस लेती है, जिससे दाने सूख जाते हैं। इसके उपचार के लिये किसान भाई इन्डोसल्फान 35 ई.सी. का 1.5 लीटर अथवा कार्बराइल (50 प्रतिशत घूलनशील चूर्ण) 1.25 किग्रा0 प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।

ईयर हेड कैटर पिलरः-इसकी गिडारें मुलायम दाने को खाकर नष्ट कर देती हैं तथा भुटृों में जाला बना देती है। इस रोग के उपचार के लिये इन्डोसल्फान 35 ई.सी का 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर का घोल बनाकर छिडकाव करें।

ज्वार का माइटः-यह बहुत ही छोटा होता है, जो पत्तियों की निचली सतह पर जाले बुनकर उन्ही के अन्दर रहकर रस चूसता रहता है। ग्रसित पत्ति लाल रंग की दिखाई पडनें लगती है तथा सूख जाती है। इस रोग के रोकथाम के लिये किसान भाईयों को डाइमेथोएट 30 ई.सी. का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा डायजिनान 20 ई.सी का 1.5 लीटर से 2 लीटर प्रति हेक्टेयर छिडकाव करें।

फसल की कटाईः-ज्वार के पौधे 110 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते है। जब पौधों पर लगी पत्तिया सूखी दिखाई देने लगे उस दौरान पौधों की कटाई कर लें। इसके फसल की कटाई दो से तीन बार तक की जा सकती है। ज्वार के पौधों को भूमि की सतह के पास से काटा जाता है तथा फसल कटाई के पश्चात्  दानों को अलग कर लिया जाता है, और उन्हें ठीक से सूखा लिया जाता है। इसके बाद मशीन के माध्यम से दानों को अलग कर लें।

फसल की पैदावार और लाभः-एक हेक्टेयर के खेत से हरे चारे के रूप में 600 से 700 क्विंटल तक फसल प्राप्त हो जाती है, तथा सूखे चारे के रूप में 100 से 150 क्विंटल का उत्पादन मिल जाता है जिसमे से 25 क्विंटल तक ज्वार के दाने मिल जाते है। ज्वार के दानों का बाजारी भाव ढाई हजार रूपए प्रति क्विंटल होता है। इस हिसाब से किसान भाई ज्वार की एक बार की फसल से 60 हजार रूपए तक की कमाई प्रति हेक्टेयर के खेत से कर सकते हैं।

images (13)

Goat Farming: इन 3 नस्ल की बकरी का पालन करने से होगा हजारों-लाखों का मुनाफा, जानें इनकी खासियत

अगर आप नौकरी से अच्छा पैसा नहीं कमा पा रहे हैं, तो आज ही इस बेहतरीन बिजनेस (Great business) को शुरु करें। जो आपको साल भर लाखों की कमाई देगा।

बकरी पालन के लिए ये हैं 3 बेहतरीन नस्ल
बकरी पालन के लिए ये हैं 3 बेहतरीन नस्ल

अगर आप अपने कम समय में अधिक लाभ कमाना चाहते हैं, तो आपके लिए पशुपालन अन्य सभी व्यापार या नौकरी से अच्छी है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले कुछ सालों से पशुपालन का बिजनेस (animal husbandry business) बड़े-बड़े शहरों में भी तेजी से फैल रहा है। लोगों को अब इसके व्यापार की अहमियत समझ में आने लगी है। पशुपालन में सबसे अधिक फायदा बकरी पालन के क्षेत्र में लोगों को मिलता है।

देखा जाए तो गाय-भैंस की तुलना में बकरी पालन में कम लागत और हजारों-लाखों का मुनाफा होता है। लेकिन ध्यान रहे इससे अच्छा मुनाफा पाने के लिए आपको अच्छी नस्ल की बकरी का पालन करना चाहिए। तो आइए इस लेख में जानते हैं कि आपको किस नस्ल की बकरी को पालना चाहिए।

बकरी पालन की बेहतरीन नस्लें (best breeds of goat farming)

जानकारी के मुताबिक, भारत में तकरीबन 50 से अधिक बकरी की नस्लों का पालन किया जाता हैं। लेकिन इसमें से कुछ ही बेहतरीन बकरियां व्यावसायिक (best goats commercial) स्तर के लिए बेहतर मानी जाती हैं। इन्हीं में से आज हम आपके लिए कुछ बकरियों की जानकारी लेकर आये हैं, जिनके नाम कुछ इस प्रकार से हैं…गुजरी बकरी, सोजत बकरी, करौली बकरी

गुजरी बकरी (Gujri Goat)

इस नस्ल की बकरी आकार में बड़ी होती है. देखने में यह अन्य बकरियों से बड़ी लगती हैं। गुजरी बकरी को किसान इसलिए सबसे अधिक पालते हैं क्योंकि इसकी दूध उत्पादन की क्षमता बेहद अधिक होती है। साथ ही इस नस्ल के बकरे का मांस भी बाजार में उच्च दाम पर बिकता है। गुजरी बकरी का पालन रेतीले स्थानों पर किया जाता है। जैसे कि अजमेर, टोंक, जयपुर, सीकर और नागौर में इसे सबसे अधिक पाला जाता है।

सोजत बकरी (sojat goat)

यह बकरी देखने में बेहद सुंदर दिखती है, लोग इसकी सुंदरता के चलते इसे अधिक पालते हैं। क्योंकि यह नस्ल पशु मेले या फिर प्रदर्शनियों में आकर्षण का केंद्र बनती हैं। देखा जाए तो सोजत बकरी अधिक मात्रा में दूध नहीं देती है, लेकिन इसके मांस मानव शरीर के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। इसी कारण से बाजार में इसके मांस अच्छी खासी कीमत पर लोग खरीदने को तैयार हो जाते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक, यह बकरी राजस्थान के कई हिस्सों में पाली जाती है।

करौली बकरी (Karauli goat)

यह बकरी दूध और मांस दोनों में बेहद अच्छी मानी जाती है। इसके दूध के सेवन करने से व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ रह सकता है। वहीं इसके मांस में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। करौली बकरी को भारत के ज्यादातर हिस्सों में पाला जाता है। खासतौर पर इसे मांडरेल, हिंडौन, सपोटरा आदि स्थानों के किसान अधिक पालते हैं। बता दें कि यह बकरी मीणा समुदाय से है।

download

Medicinal Plants: घर में जरुर लगाएं ये पांच औषधीय पौधे, कई रोगों से मिलेगी मुक्ति

आपको ये पांच औषधीय पौधे घर में जरुर लगाने चाहिए। इससे कई बड़ी बीमारियों से मुक्ति मिल सकती है।

बीमारी से निजात दिलाएंगे ये पांच औषधीय पौधे
बीमारी से निजात दिलाएंगे ये पांच औषधीय पौधे

पुराने जमाने से बड़ी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए औषधीय पौधों का इस्तेमाल होता रहा है। आज भी कई आयुर्वेदिक दवाइयों में इसका उपयोग किया जाता है। ये हमें कई रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। आज हम आपको चार ऐसे खास औषधीय पौधों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनमें डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों को रोकने की क्षमता है। आइए, उनपर एक नजर डालें।

मेथी का पौधा

मेथी का पौधा

मेथी का पौधा

मेथी के पौधे में ढेर सारे औषधीय गुण होते हैं। इसे कई लोग घर में गमलों में लगाते हैं। सब्जी के रूप में इसकी भाजी को भी खूब पसंद किया जाता है। मेथी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है। इसे खाने से हृदय, पेट, कब्ज, त्वचा और लीवर संबंधित रोग दूर रहते हैं। इसके अलावा, यह ब्लड शुगर को भी कंट्रोल करता है। वहीं, इसका सेवन करके बालों को झड़ने से भी रोका जा सकता है। मेथी को कई आयुर्वेदिक दवाइयों को बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। अगर शरीर में सूजन हो तो मेथी के पत्तों को पीसकर उसपर लगाने से आराम मिलता है। इसलिए, घर में मेथी के पौधे को जरुर लगाएं।

इंसुलिन का पौधा
इंसुलिन का पौधा

इंसुलिन का पौधा

इंसुलिन का पौधा भी आपके कई काम आ सकता है। इंसुलिन का इस्तेमाल हम डायबिटीज के इलाज के लिए कर सकते हैं। यह इसे जड़ से खत्म करने की भी क्षमता रखता है। हालांकि, यह पौधा आसानी से नहीं मिलता है। लेकिन अपने घर में इसे जरुर लगाना चाहिए।

कढ़ी पत्ता
कढ़ी पत्ता

कढ़ी पत्ता

जब औषधीय पौधों की बात होती है तो कढ़ी पत्ता का नाम भी सबसे ऊपर आता है। ये शरीर में कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। इसमें कई औषधीय गुण होते हैं। कढ़ी पत्ता आंख, त्वचा, बाल, हृदय और लिवर के लिए लाभदायक होता है। इसका सेवन करके वजन भी घटाया जा सकता है। वहीं, ये डायरिया से भी बचाव करता है। इसलिए, अपने घर में इसे भी जरुर लगाएं।

लैवेंडर का पौधा
लैवेंडर का पौधा

लैवेंडर का पौधा

लैवेंडर के कई फायदे हैं। सबसे पहले ये अनिद्रा की बीमारी को दूर करता है। जिन लोगों को नींद नहीं आती है, वह इसे तकिये के नीचे रखकर सो सकते हैं। इसका फायदा तुरंत देखने को मिलेगा। इसके अलावा, डिप्रेशन के शिकार लोगों के लिए भी लैवेंडर रामबाण है। इसका सेवन करके माइग्रेन व तवचा संबंधित रोगों से निजात पाया जा सकता है।